राजेश मिश्रा, आगरा: आगरा में दवा के अवैध कारोबार ने जो बुलंद इमारत खड़ी की है उसकी नींव रखी गई थी कटिंग और रीपैकिंग पर। ये बुलंदी इतनी हो गई है कि न तो यहां तक पहुंच पाना संभव है और न ही इसकी नींव को खंगाल पाना। नकली और असली दवा के खेल में ये धंधेखोर इतनी बदमाशी सीख गए हैं कि उन्हें जेल की सलाखों तक न तो पहुंचाने की जरूरत समझी गई और न ही हिम्मत हो पाई। धंधेखोरों की ओर से दी गई चांदी के जूते की मार से जिम्मेदार भी बेशर्मी की चादर ओढते रहे।
अब आते हैं कटिंग पर। दवा बाजार में ये शब्द बहुत प्रचलन में है। जो दवा कंपनी रेट पर मान लो 100 रुपये में बिकती है, कटिंग में यही दवा 50 रुपये तक में मिल जाएगी। यानी ये कहा जाए कि कटिंग की दवा का कोई रेट नहीं है। जैसा सौदा पट जाए। तीन दशक पहले की बात की जाए जो ज्यादातर दवा की सप्लाई हॉकर के जरिए होती थी। यही हॉकर बाजार में कटिंग की दवा बेचते थे। कटिंग ये दवा कहां से आई, कितनी आई, इसके बारे में न तो दुकानदार पूछता था और न ही ड्रग विभाग। जानकार बताते हैं कि ये दवा या तो कंपनी की मिलीभगत से बाजार में उतारी जाती थी या फिर कंपनी प्रिंट से हूबहू मेल खाती पैकिंग में तैयार की जाती थी। इसी कटिंग के बूते कई हॉकर अमीर होते गए। और आज, ये दवा के बडे कारोबारी बन चुके हैं। कई ने अतिरिक्त बिजनेस शुरू कर दिए हैं। किसी ने हाईवे पर होटल खोल लिया है तो किसी ने अपना प्रोडक्ट लांच कर दिया है। चल-अचल संपत्ति भी जुटाई।
यही हाल रीपैकिंग का है। आगरा में दवा की रीपैकिंग का धंधा भी कम से कम तीन दशक पुराना ही है। सैंपल की दवा की बिक्री प्रतिबंधित है। कंपनियां अपने उत्पादन का एक हिस्सा सैंपल के नाम पर उतारती हैं। अवैध धंधे के बदमाश लोग सैंपल की दवाओं के जखीरा को हासिल कर उसे कंपनी की तरह रीपैकिंग कर एक-एक खेप पर लाखों रुपये कमाते रहे। पैसे की भूख मिटाने के लिए कुछ धंधेखोरों ने इससे भी आगे कदम बढ़ाया। दिल्ली, उत्तराखंड, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र में किसी भी फैक्ट्री में दवा बनवाई और उसे ब्रांडेड कंपनी के नाम पर रीपैकिंग कराकर बाजार में उतार दिया। दो-चार रुपये में तैयार होने वाली गोली कंपनी की एमआरपी पर बेची जाती। इतना ही नहीं, इस खेल के कुछ खिलाड़ी तो इतने माहिर हो चुके थे कि कंपनी से दवा की खेप निकलने के बाद अपने गंतव्य तक पहुंचने से पहले ही ट्रक को हाइजेक कर लेते। पूरा जखीरा आगरा में लाकर यहां से पूरे देश में सप्लाई करते।इस खेल ने तमाम धंधेखोरों को अचानक अमीर बना दिया।
दवा बाजार में आज भी कुछ ऐसे दुकानदार हैं जो न कटिंग के चक्कर में पड़े और न रीपैकिंग के खेल में। ऐसे दुकानदार आज दुकान में बैठे मक्खियां मार रहे हैं। जबकि उनके देखते ही देखते तमाम अप्रत्याशित रूप से इतने अमीर हो गए हैं जिसका अनुमान भी वे लगाने में असमर्थ हैं।
रेलवे स्टेशन और प्राइवेट बस अडडों पर ऐसी खेप रात में उतरती थीं। इनके ठेकेदार बाजार तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाते थे। इसकी एवज में मोटी कमाई करते थे। औषधि विभाग ही नहीं, तब वाणिज्य कर और अब जीएसटी के साथ ही अन्य संबंधित विभागों की एक-एक रात लाखों की होती थी।
स्वास्थ्य विभाग के अधीन औषधि अनुभाग ने भी अमीर बनने की बहती गंगा में खूब डुबकियां लगाईं। औषधि अनुभाग को एक-एक शातिर की करतूतों की जानकारी रहती थी। एक बार भी स्थानीय स्तर पर किसी भी मेडिकल स्टोर या गोदाम पर छापा नहीं मारा गया। कारण, कार्रवाई से पहले ही सेवा हो जाती। एक-एक मेडिकल स्टोर से हजारों की महीनेदारी आती रही। महीनेदारी का सिलसिला अभी भी जारी है।
अस्पताल के नाम पर बल्क आर्डर पर खेल
दवा के धंधेखोरों ने एक और नया खेल शुरू कर दिया है। कंपनियां बड़े-बड़े अस्पतालों के लिए सप्लाई करती हैं। बल्क में आर्डर के तहत कंपनियां इन्हें कीमत में छूट देती हैं। धंधेखोरों ने कंपनियों से सेटिंग कर ऐसी बल्क सप्लाई पर कब्जा कर लिया है। सस्ते दामों पर दवा लेकर एमआरपी पर बाजार में उतारते हैं।
मेरी बात
मैनपुरी के एक छोटे से गांव से आकर आगरा महानगर में एक कदम रखने का प्रयास किया। एक अनजान युवक को अपना ठौर-ठिकाना बनाने की चुनौती थी। दैनिक जागरण जैसे विश्व प्रसिद्ध समाचार समूह ने सेवा करने का सुअवसर प्रदान किया। 9 जुलाई 2025 को दैनिक जागरण समाचार पत्र समूह से सेवानिवृत्त होने तक के पत्रकारिता के सफर के दौरान कई पड़ाव पार किए, कई पायदान चढ़े। समाज के विभिन्न वर्गों की रिपोर्टिंग की। सामाजिक और मानवीय संवेदनाओं से भरे पहलू मेरी पत्रकारिता के प्रमुख आधार रहे। संप्रति में दैनिक भास्कर समूह से जुड़कर अपनी पत्रकारिता के नए दौर में प्रवेश रखा है। अब कुछ अलग करके दिखाने की तमन्ना है। हमारे आसपास ही तमाम ऐसे कार्यकलाप होते हैं जो जनहित और समाजहित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, निभा सकते हैं लेकिन स्पष्ट कहूं तो कूपमंडूकता के कारण हम यहां तक पहुंच नहीं पाते, जान नहीं पाते। हम ऐसे ही अदृश्य व्यक्तित्व और कृतत्व को आपके सामने लाने का प्रयास करेंगे।
जय हिंद











अब पूरा हो धंधा खोलनके मानोगे भाई,कुछ तो छुपा रहने दो।
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