Health

आगरा के एक डाक्टर जिन्होंने गर्भस्थ शिशु की किडनी में कैंसर की खोज दुनिया में सबसे पहले की थी

राजेश मिश्रा, मेडिकल कालेज, आगरा के पूर्व माइक्रोबायोलॉजी विभागाध्यक्ष डा. बी एम अग्रवाल ने गर्भस्थ शिशु की दोनों किडनियाें में कैंसर की खोज 47 वर्ष पहले यानी 1978 में ही कर ली थी। ये खाेज उस समय दुनिया में सबसे पहले की थी। डा. अग्रवाल तब मेडिकल कालेज की पैथोलॉजी विभाग में कार्यरत थे। तब माइक्रोबायोलॉजी सेक्शन पैथोलॉजी विभाग का एक सूक्ष्म अंग हुआ करता था। बाद माइक्रोबायोलॉजी विभाग सृजित हुआ और वे पहले विभागाध्यक्ष बनाए गए थे। गर्भस्थ शिशु की दोनों किडनियों में कैंसर का पता लगने की कहानी किवदंती नहीं बल्कि प्रमाण सहित है।
ये वर्ष 1978 की बात है। एसएन मेडिकल कालेज,आगरा में एक गर्भवती महिला स्त्री रोग विभाग में परीक्षण कराने आई थी। उसका पेट अप्रत्याशित रूप से बहुत फूला हुआ था। प्रथम दृष्टया देखने से ही पता चल रहा था कि ये स्थिति गर्भस्थ शिशु के असामान्य आकार के कारण है। तब जांच के लिए आज की तरह अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन और यहां तक एक्स-रे की भी सुविधा नहीं थी। गर्भस्थ शिशु की मृत्यु हो गई थी। शिशु का पेट अकल्पनीय रूप से बड़े आकार का था। डा. अग्रवाल बताते हैं कि स्त्री रोग विभागाध्यक्ष ने ये केस उन्हें रेफर किया। मैंने शिशु के शव की ऑटोप्सी कराई। ऑटोप्सी शव के परीक्षण के लिए एक ऐसी शल्य क्रिया होती है जिसमें मृत्यु के कारण का स्पष्टता से पता चल जाता है। मसलन, किस बीमारी से मृत्यु हुई। घटना-दुर्घटना या अन्य किसी परिस्थितिवश मृत्यु होने पर पोस्टमार्टम कराया जाता है, लेकिन, इसमें आमतौर पर चोट आदि के निशान, गोली लगने के निशान या जहर सेवन से मृत्यु के कारण को देखा जाता है। लेकिन, ऑटोप्सी में पता लगाया जाता है कि मृत्यु किन कारणों और किन तरीकों से हुई। पोस्टमार्टम में मृत्यु का कारण स्पष्ट न होने पर बिसरा सुरक्षित रख लिया जाता है और फोरेंसिक लैब में इसकी जांच कराई जाती है।  
 डा. अग्रवाल बताते हैं कि ऑटोप्सी के दौरान गर्भस्थ शिशु की दोनों किडनियां सामान्य से करीब आठ गुना बढ़े आकार की पाई गईं। पेट फूलने का यही एकमात्र कारण था। दोनों किडनी में गांठें ही गांठें थीं। ये गांठें कैंसर की थीं। डा. अग्रवाल बताते हैं कि उस दौरान चिकित्सा विज्ञान आज की तरह तकनीकी रूप से उतना सुदृढ़ नहीं था। इस प्रकरण में जांच और परीक्षण के लिए सिवाय अनुभव ही एकमात्र रास्ता था। गर्भस्थ शिशु की किडनी में कैंसर का पाया जाना उस समय के लिए एक चौंकाने वाली बात थी। खासतौर पर पूरे चिकित्सा जगत के लिए। अब एक चुनौती सामने थी। इस तरह का कोई केस पहले भी कभी संज्ञान में आ चुका है? ये जानने के लिए चिकित्सा विज्ञान के जर्नल्स का अध्ययन करना जरूरी था। आगरा में तो इसके लिए कोई संसाधन था ही नहीं। हां, दिल्ली में एम्स के पास मेडिकल लाइब्रेरी थी। मामूली वेतन, आवागमन के सीमित संसाधन और समय की व्यस्तता। खैर, मामला जितना पेचीदा था, उतना ही चुनौतीपूर्ण। डा. अग्रवाल बताते हैं कि वे आगरा छावनी स्टेशन से आंध्र प्रदेश एक्सप्रेस(एपी एक्सप्रेस) में बैठते। दिल्ली पहुंच मेडिकल लाइब्रेरी पहुंचते। वहां जर्नल का अध्ययन करते। कई दिनों तक यही शैडयूल रहा। दो दर्जन से ज्यादा जर्नल्स के अध्ययन के बाद नोट्स तैयार किए। इस अध्ययन से ये भी स्पष्ट हो गया था कि तब तक इस तरह का कोई केस चिकित्सा जगत के संज्ञान में नहीं आया था। यानी, आगरा के एसएन मेडिकल कालेज में उनके द्वारा परीक्षण किया गया ये केस अपने आप में अनूठा और पहला था। पूरी तरह से आत्मविश्वास हो जाने पर डा. अग्रवाल ने इस स्टडी को प्रकाशन के लिए एक ब्रिटिश जर्नल के लिए भेज दिया। अपार खुशी तब हुई,जब उनकी स्टडी इस जर्नल में वर्ष 1979 में प्रकाशित हो गई। ये स्टडी तब दुनिया में पहली और अनूठी थी।

इस जर्नल में हुआ था प्रकाशन
ब्रिटिश जर्नल आफ यूरोलॉजी विद डायग्नोसिस आफ विम्स ट्यूमर विद पॉली सिस्टक किडनी। ये विश्व चिकित्सा जगत में पहली केस रिपोर्ट थी।

सबसे बडा सवाल, कोख में शिशु को कैंसर हुआ क्यों और कैसे
डा.अग्रवाल ने बताया कि कोख में शिशु की दोनों किडनियों में कैंसर होना तब चिकित्सा जगत के लिए बहुत चौंकाने वाली बात थी। चूंकि शिशु को कैंसर होने का मतलब था कि गर्भधारण से लेकर गर्भावस्था के दौरान तक कोई न कोई कारण रहा होगा। ये कारण, जेनेटिक हो सकता था, या पिता या माता के शरीर में विकृति के कारण भी। ये पता लगाने के लिए जेनेटिक हिस्ट्री जरूरी थी लेकिन, तब न ताे इसके लिए संसाधन थे और न ही माता-पिता इसके लिए तैयार थे। उन्हें समझाया भी गया कि अगले इश्यू को इस तरह की कोई शारीरिक परेशानी न हो, इसके लिए परीक्षण और बचाव जरूरी है। लेकिन, ये संभव नहीं हाे सका। इसके साथ ही ये सवाल भी सवाल ही रह गया कि आखिर, गर्भस्थ शिशु की दोनों किडनियों में इतना गंभीर कैंसर कैसे हो गया? आमतौर पर कैंसर के विभिन्न चरण पूरे होने में वर्षों लग जाते हैं लेकिन, शिशु तो मात्र नौ महीने का ही था।

डा. बी एम अग्रवाल के नाम उपलब्धियाें की लंबी कतार है
– एसएन मेडिकल कालेज आगरा में 1986 में माइक्रोबायोलॉजी विभाग की स्थापना हुई। वे इसके संस्थापक थे। 18 वर्षों तक वे विभागाध्यक्ष के साथ ही टीचिंग, ट्रेनिंग और रिसर्च वर्क के इकलौते व्यक्तित्व रहे।
-1994 में डब्ल्यूएचओ ने उन्हें फाेलोशिप दी। इसके तहत यूके और अमेरिका में छह महीने तक अध्ययन और रिसर्च का अवसर मिला। ये उपलब्धि अब तक राज्य मेडिकल कालेजों में उनके ही नाम है।
-वर्ष 1994 में इंटरनेशनल ऑटोमिक इनर्जी एजेंसी (आईएईए)आस्ट्रिया वियाना यूएनओ ने मॉलीक्यूलियर टेक्नोलॉजी फॉर डायग्नोिसस आफ माइक्रोबैक्टीरियम के लिए ग्रांट दी थी। ये ग्रांट दुृनिया के सात देशों के विशेषज्ञों को दी गई थी, जिसमें भारत भी एक था।
-डा. अग्रवाल के कार्यकाल के दौरान एसएन मेडिकल कालेज, आगरा का माइक्रोबायोलॉजी विभाग देश के शीर्ष 14 संस्थानों में शुमार था। ये प्रमाण नेशनल इंस्टीटयूट आफ बायोलॉजिकल ने दिया था।
– राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जर्नल में 72 रिसर्च पेपर प्रकाशित हो चुूके हैं।
-यूपी स्टेट मेडिकल कालेज की ओर से डा. अग्रवाल पहले विशेषज्ञ हैं जो डीएनबी एक्जामनर बनाया गया।
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मेरी बात मैनपुरी के एक छोटे से गांव से आकर आगरा महानगर में एक कदम रखने का प्रयास किया। एक अनजान युवक को अपना ठौर-ठिकाना बनाने की चुनौती थी। दैनिक जागरण जैसे विश्व प्रसिद्ध समाचार समूह ने सेवा करने का सुअवसर प्रदान किया। 9 जुलाई 2025 को दैनिक जागरण समाचार…

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