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एक शहर जहां मृतकों की अस्थियों को पुलिस देती है सलामी

कुमार ललित, आगरा: दुनिया भर में आगरा की पहचान ताजमहल के नाम पर है लेकिन, ये ऐसा भी शहर है जहां पर लावारिस मृतकों की अस्थियों को पुलिस द्वारा सलामी दी जाती है। सलामी के बाद अस्थि कलशों को सोरों ले जाकर गंगा में पूरे विधिविधान से विसर्जित किया जाता है। विगत 40 वर्षों से लावारिस अस्थियों की सेवा और 28 वर्षों से माँ गंगा में उनको विसर्जित करने की अनोखी सेवा श्री क्षेत्र बजाजा कमेटी, आगरा द्वारा की जा रही है।

 इस सेवा यात्रा के पहले पथिक श्री क्षेत्र बाजाजा कमेटी के संरक्षक प्रमुख समाजसेवी अशोक गोयल बताते हैं कि उन दिनों हम अक्सर श्मशान घाट पर सेवा कार्य हेतु जाते थे। एक दिन जब हम वहाँ पहुँचे जहाँ अज्ञात मृतकों की अस्थियाँ सुरक्षित रखी जाती थीं, तो मन में एक विचित्र कंपन हुआ। ऐसा लगा मानो लावारिस अस्थियाँ हमें पुकार कर कह रही हों कि “हमारे लिए कुछ करो…”।    पहले तो हमने इस भावना को सामान्य मन: स्थिति मानकर अनदेखा कर दिया। परंतु जब यही अनुभूति आठ-दस दिन के अंतराल में फिर हुई, और फिर तीसरी, चौथी, पाँचवीं बार भी हुई तब हमें लगा कि यह कोई भौतिक संकेत मात्र नहीं, बल्कि प्रभु की अलौकिक प्रेरणा है।

  इस विषय पर पूज्य गुरु, डॉ. चंदनलाल पाराशर जी से परामर्श किया। उन्होंने बिना किसी संकोच के कहा- “इन आत्माओं की शांति के लिए श्रीमद्भागवत कथा से श्रेष्ठ कुछ नहीं।”

     इसके बाद हमने श्मशान घाट पर भागवत कथा आयोजन की योजना बनानी शुरू की। कथा वाचन हेतु हमने अपने पारिवारिक मंदिर के पुजारी पंडित मदन मोहन शास्त्री जी से अनुरोध किया। पहले तो वे चकित रह गए, फिर बोले- “श्मशान पर कौन कथा सुनने आएगा?” हमने सहजता से उत्तर दिया–“हमें आम जनता को नहीं, इन अज्ञात आत्माओं को कथा सुनानी है।”  वे थोड़े ठिठके, पर जब मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि मैं स्वयं कथा में धर्मपत्नी सहित प्रतिदिन उपस्थित रहूँगा, तो उन्होंने सहमति दे दी।

 इस प्रस्ताव को समिति से भी स्वीकृति मिल गई। इस महत्वपूर्ण सेवा कार्य में सुनील विकल और टीएन अग्रवाल सहित सभी कपड़ा व्यवसायी विशिष्ट सहयोगी रहे।

 रथ यात्रा निकाल कर अज्ञात मृतक आत्माओं को किया आमंत्रित

        अशोक गोयल बताते हैं कि जब भागवत कथा का आयोजन सुनिश्चित होने के बाद एक रथ यात्रा मोक्ष धाम ताजगंज से विद्युत शवदाह गृह (बैकुंठ धाम) के डेढ़ किलोमीटर क्षेत्र में निकाली गई। रथ यात्रा द्वारा अज्ञात मृतकों की आत्माओं का आवाह्न कर उन्हें भागवत कथा में आने का आमंत्रण दिया गया।

 मौत के चौराहे (महारानी अवंती बाई चौराहा) पर कौन सुनने आएगा कथा!!

  सब यही सोच रहे थे कि मौत के चौराहे पर कौन सुनने आएगा कथा!! पर प्रभु की लीला का किसे पता था कि लोग जुड़ते चले जाएंगे और एक कारवाँ बन जाएगा..। अशोक गोयल बताते हैं कि कथा के लिए एक छोटा-सा, लेकिन मर्यादित पंडाल लगाया गया था। विद्युत शवदाह गृह के समीप का चौराहा तो “मौत का चौराहा” कहलाता था।लेकिन… प्रभु की लीला देखिए — कथा प्रारंभ होते ही वातावरण बदल गया। जनमानस उमड़ पड़ा। शहर के सभी अधिकारी, संतजन, श्रद्धालु… सब उपस्थित हुए।

      कथा के उपरांत, इन अस्थियों को गंगा विसर्जन हेतु ले जाने से पहले अस्थियों को शहर की चारों दिशाओं में स्थित प्रमुख शिव मंदिरों, मस्जिदों, अब्बू लाला की दरगाह और गुरुद्वारों में ले जाकर प्रार्थना की गईं, और फिर सोरों स्थित गंगा जी में अस्थियों को विधिवत विसर्जित किया गया।

अब इसे कोई नहीं कहता अपशकुनी चौराहा

 भागवत कथा के दिव्य आयोजन और सर्वधर्म स्थलों पर प्रार्थनाओं के साथ-साथ पवित्र गंगा में विसर्जन की प्रक्रिया का सुखद परिणाम यह हुआ कि अवंती बाई चौराहे पर असमय और अकाल दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों पर विराम लग गया। लोगों ने धीरे-धीरे इसे मौत का चौराहा या अपशकुनी चौराहा कहना छोड़ दिया।

जब एसएसपी बोले, आप तो पागल हो गए गोयल साहब

 अशोक गोयल ने बताया कि 29 साल पहले की बात है। हम तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से मिले और उनसे आग्रह किया कि इन अज्ञात मृतकों की अस्थियों को पुलिस की सलामी दी जाए। पहले तो वे हँस पड़े और बोले –“गोयल साहब, आप तो सचमुच पागल हो गए हैं।” मैंने विनम्रता से कहा- “हाँ, हम पागल हैं, क्योंकि हम उन लावारिस लाशों को लकड़ी देते हैं जिन्हें पुलिस नाले में फेंक देती है। हम पागल हैं क्योंकि हम अस्थियों को इस प्रकार सहेज कर रखते हैं कि कभी कोई पहचान हो तो पुलिस के द्वारा उसके वस्त्र आदि के साथ उन्हें परिवार को लौटाया जा सके। हम पागल हैं क्योंकि हम हर अज्ञात अस्थि को सुभाष चंद्र बोस की अस्थि समझते हैं।”  मेरे इन वचनों का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक  पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने सलामी की अनुमति दे दी। तब से आज तक आगरा नगर में 24 अगस्त को अज्ञात मृतकों की अस्थियाँ गंगा विसर्जन हेतु जाती हैं, उन्हें पुलिस द्वारा सलामी दी जाती है।

 लावारिस अस्थियों को करवाई ब्रज चौरासी कोस की पावन अद्भुत यात्रा

  अशोक गोयल ने बताया कि इन अस्थियों को एक बार ब्रज 84 कोस की यात्रा कराई गई। इसमें ब्रज के बड़े-बड़े संत, जिनके दर्शन दुर्लभ होते थे, वे केवल इन अज्ञात मृतकों की अस्थियों के निमित्त आमंत्रण पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने आए।

मेरी बात मैनपुरी के एक छोटे से गांव से आकर आगरा महानगर में एक कदम रखने का प्रयास किया। एक अनजान युवक को अपना ठौर-ठिकाना बनाने की चुनौती थी। दैनिक जागरण जैसे विश्व प्रसिद्ध समाचार समूह ने सेवा करने का सुअवसर प्रदान किया। 9 जुलाई 2025 को दैनिक जागरण समाचार…

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