Political

पूरब पावरफुल, पश्चिम नकारा

-प्रदेश-देश की सियासत में नेतृत्व शून्य की ओर पश्चिमी यूपी का आगरा परिक्षेत्र

-न तो कोई ‘नेताजी’ बन सका और न ही ‘बाबू जी’, अपने घर में ही सिमट कर रह गए कई धुरंधर

-सत्ता और संगठन में उच्च पद तो पाए लेकिन, नेतृत्व की क्षमता न दिखा पाए

राजेश मिश्रा, आगरा

 पश्चिमी उप्र के प्रमुख आगरा परिक्षेत्र में जातीय समीकरणों ने गांव के गांवों में सियासी अंकगणित के ऐसे फार्मूले निकाले गए कि कोई क्षेत्र जाटलैंड कहा जाने लगा तो कोई ‘मिनी छपरौली’ और ‘मिनी बागपत’। समय गुजरा और सियासी दलों ने आगरा को दलितों की राजधानी की संज्ञा दे दी। राजशाही रियासत की विरासत के रूप में सियासत मिली। राजनीतिक दलों ने जातीय समीकरण साधने को संगठन में तमाम लोगों को उच्च पदों पर बैठाया, संगठन के बैनर और समाज की सहभागिता से जनप्रतिनिधि चुने गए तो सत्ता में भागीदारी भी दी। कुछ बरस पहले तक नेताजी और बाबू जी के सियासी आभामंडल पर गुमान कर रहा पश्चिमी यूपी आज मायूस है, निराश है, हताश है। कारण, ब्राह्मण विधायकों के ‘सहभोज’, क्षत्रिय विधायकों के ‘कुटुम्ब’ में आगरा परिक्षेत्र की चर्चा तक नहीं हो पाई। सत्ता और संगठन के प्रति निष्ठा या बगावत के भाव को लेकर नहीं, लेकिन ये तो अपेक्षा की ही जा सकती थी कि हुंकार भरने वाला कोई एक सूरमा पश्चिम यूपी से भी है। जातीय सियासत में प्रदेश भर में नेतृत्व के नाम पर कोई चेहरा दम नहीं दिखा पाया। ऐसा नहीं है कि इसके लिए मौके नहीं मिले। खूब अवसर आए लेकिन, घर से बाहर निकलने का न तो जज्बा दिखा पाए और न ही जरूरत समझी।

 बदलाव एक शाश्वत प्रक्रिया है और राजनीति भी इससे अछूती नहीं है। आजादी के बाद से ही इस क्षेत्र में कांग्रेस का दबदबा रहा है। इमरजेंसी के बाद स्थानीय राजनीतिक परिदृश्य में बहुत तेजी से परिवर्तन हुए। उस समय कांग्रेस के गुलाब सेहरा चमके, मंत्री भी बने। लेकिन, उनका प्रभाव क्षेत्र आगरा से बाहर नहीं जा पाया। इसी समय रामजीलाल सुमन ने फिरोजाबाद सीट से जीत हासिल कर सबसे कम उम्र के सांसद बनने का परचम फहराया था। चौधरी चरण सिंह के बेहद करीबी और टूंडला निवासी चौधरी मुल्तान सिंह का जाट राजनीति में दबदबा रहा है। ‘मिनी छपरौली’ आगरा में ही है। इसी चाहरवाटी में जन्में अजय सिंह बीपी सिंह सरकार में केंद्रीय मंत्री बने। वे तब जनता दल के अजित सिंह के साथ थे लिहाजा जाट समुदाय में उनका प्रभुत्व अजित सिह के सियासी आभामंडल में चमक नहीं पाया। पनवारी प्रकरण के बाद चौधरी बाबूलाल जाट राजनीति में अचानक सूरज की तरह चमके। सभी दलों की निगाहों में चढ़ गए। इसका फायदा भी उन्हें मिला। मगर, आगरा से बाहर जाट राजनीति में वे कोई कमाल नहीं कर सके। मथुरा में चौधरी लक्ष्मीनारायण इस पंक्ति में बहुत आगे हैं लेकिन, छाता मोह ने उन्हें जाट राजनीति में व्यापकता नहीं लेने दी। वे ऐसे जनाधार वाले नेता हैं कि छाता क्षेत्र में संगठन की पहचान उनसे ही होती है। मथुरा में जब जाट राजनीति की बात होती है तब रालोद संस्थापक परिवार की ओर ही निगाहें ठहर जाती हैं।

भाजपा की बात करें तो सत्यप्रकाश विकल, हरद्वार दुबे,रमेश कांत लवानियां, भगवान शंकर रावत ने बहुत लोकप्रियता हासिल की। पार्टी के बैनर तले सांसदी और विधायकी पाने में कामयाब हुए लेकिन, नेतृत्व के लिए न तो पार्टी ने इनमें तलाश की और न ही इनमें से कोई अपने आपको साबित कर पाया। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रदेश नेतृत्व के लिए आगरा के कुछ नाम चर्चा में जरूर आए लेकिन, ताज पूरब के सिर ही सजाया गया। एक बार सत्ता में सेकंड पॉजीनेशन के लिए भी आगरा की चर्चा चली लेकिन, हकीकत न बन सकी।  ब्राह्मण नेताओं में हाथरस के रामवीर उपाध्याय जरूर उभरे। लेकिन, पार्टी में पूर्वांचल के सतीश मिश्रा की एंट्री और फिर उनकी ऊंची उड़ान ने रामवीर उपाध्याय को पीछे होने को मजबूर कर दिया। हालात यहां तक पहुंचे कि पार्टी छोड़नी पड़ी। इसके बाद बीमारी ने उन्हें ऐसा चपेट में ले लिया कि उबर ही नहीं पाए।

बाहर भी किस्मत आजमाई, सफलता नहीं मिली

रामजीलाल सुमन खांटी राजनीतिज्ञ हैं। सत्ता में रहें हों या नहीं, लेकिन उनके आवास पर उनके जनाधार का नजारा कभी कम नहीं हुआ। उन्होंने एक बार बयाना से सांसदी का चुनाव लड़ा लेकिन, जीत हासिल नहीं हो पाई। टूंडला के मूल निवासी राजबब्बर ने आगरा और फिरोजाबाद में तो जीत हासिल की लेकिन, परिसीमन के बाद सृजित फतेहपुर सीकरी सीट पर हार गए। दो-दो बार। गुरुग्राम में भी उन्हें जीत नहीं हासिल हुई। हालांकि, आगरा के राजबब्बर ने कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बनकर एक मुकाम जरूर हासिल किया।

 दैनिक जागरण के पूर्व संपादकीय प्रभारी विनोद भारद्वाज कहते हैं कि जाति की राजनीति मुलायम सिंह ने शुरू की। मायावती ने उसे परवान चढ़ाया। इसके बाद सभी दलों के लिए जातीय राजनीति करना मजबूरी बन गई। जहां तक नेतृत्व की बात है तो स्थानीय स्तर पर राजनेता सांसदी और विधायकी तक ही सीमित रहे। मुलायम और कल्याण जैसी न तो उनमें दूरदर्शिता है और न ही सियासी समझ। और सबसे बड़ा कारण है कि नेता बनने के लिए जोखिम क्यों उठाएं? 

डीएलए के संपादक एसपी सिंह बताते हैं कि भदावर नरेश राजा रिपुदमन सिंह का अपने दौर में जलवा था। बाह और आगरा ही नहीं, आसपास के जिलों में भी लोग उनकी बात मानते थे। लेकिन, उनके पुत्र अरिदमन सिंह बाह क्षेत्र से बाहर नहीं निकल पाए। ये बात सही है कि बाह क्षेत्र में उनका प्रभाव कायम है। वे मानते हैं कि अब के राजनेता अपने क्षेत्र से बाहर निकलने की सोचते ही नहीं हैं। जब कुछ विशेष करेंगे, तभी तो पार्टी और समाज उनके लिए कुछ विशेष सोच पाएगा।

करीब तीन दशक तक आगरा और आसपास की राजनीति की नस-नस पर नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुभाष रावत तो कहते हैं कि आज के राजनेता जिस आभा को देखकर गदगद होते हैं, दरअसल ये लोग पद, गरिमा के आभामंडल की चकाचौंध में आते हैं। काम कराने की क्षमता है, इसलिए लोग भी आते हैं। लेकिन, ये स्थायी तो नहीं है। न पद और न ऐसे लोग। आगरा के तमाम राजनेता इसी मुगालते में रहे और आगरा से बाहर रुतबा न बना सके। वे कहते हैं कि फील्ड में सक्रियता और राजनीति का जुनून कोई रामजीलाल सुमन से सीखे। अक्सर वे रात में अखबार के दफ्तर में आ जाते थे पेन और कलम लेकर। वहीं पर बैठकर दिन भर की गतिविधियों का प्रेस नोट बनाकर देते थे। एक दौर में उनका आगरा और अलीगढ़ में काफी प्रभाव रहा है।

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