-एसटीएफ के रडार पर तमाम नाम, इनका भी आएगा नंबर
-एक से एक करोड़ की रिश्वत का ऑफर और दूसरे ने कुछ नहीं.., एक झटके में नाप दिए गए ड्रग आफीसर नरेश मोहन
-बगैर बिल से आ रही दवाओं की खेप पर परदा डालता रहा जीएसटी विभाग
राजेश मिश्रा, आगरा: दवा बिक्री के राष्ट्रीय फलक पर आगरा का फव्वारा क्षेत्र नकली, घटिया और अवैध दवाओं की सबसे बड़ी मंडी के रूप में तो कुख्यात थी ही, सिकंदरा क्षेत्र में नकली दवा की फैक्ट्री पकड़े जाने के बाद आगरा का दवा बाजार शासन की निगाहों में चढ़ गया। नकली दवा निर्माण फैक्ट्री का पर्दाफाश करने के बाद एसटीएफ ने रेलवे स्टेशन से पार्सल का पीछा करते-करते फव्वारा आकर हे मां मेडिकल और बंसल मेडिकल को ऐसा शिकंजे में कसा कि अवैध कारोबारियों की नींद उड़ गई है। नई-नई दौलत वालों की कुंडली बनाई और खंगाली जा रही है। एक-एक को रडार पर लिया जाएगा।
मरीज जिस दवा को ये भरेासा करके खाते हैं कि उन्हें जीवनदान मिल जाएगा, पैसे की भूख मिटाने के लिए दवा के धंधेखोर उन मरीजों के लिए घटिया दवा बेच रहे हैं। इन धंधेखोरों को इतना भी अहसास नहीं है कि इन मरीजों में कोई उनके अपने भी हो सकते हैं। मगर, अमीर बनने की होड़ में मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ करने में हिचक भी नहीं आती। वो तो अच्छा हुआ कि एसटीएफ ने न केवल ऐसे चेहरों को बेनकाब कर दिया बल्कि एक करोड़ की रिश्वत के आफर को भी ठुकरा दिया। रिश्वत का आंकड़ा भले ही चौंकाने वाला हो लेकिन, रिश्वत लेने और देने का तरीका फव्वारा दवा बाजार के लिए कतई नया नहीं है। इसका आधार ये है कि एक बार जो अवैध कारोबार में पकड़ा गया, क्या उसने ये गैरकानूनी धंधा छोड़ दिया? हां तो नहीं हो सकता। नहीं छोड़ा तो उस पर फिर कार्रवाई क्यों नहीं की गई। सीधा जवाब है-नियमित सेवा शुरू। यही चलन दवा बाजार में नए-नए खिलाड़ी पैदा और पोसता रहा। आज ऐसे खिलाड़ियों की संख्या तीन दर्जन से ज्यादा बताई जा रही है। इनकी अमीरी का सफर बहुत पुराना नहीं है। अधिक से अधिक पांच साल, दस साल।
फव्वारा दवा बाजार में गोदामों की पड़ताल के दौरान जिस औषधि अधिकारी नरेश मोहन को शासन की ओर से विशेष रूप से भेजा गया था, उसे एक झटके में वापस बुला लेने के पीछे भी एक कहानी है। जानकारों के अनुसार, नरेश मोहन ने रिपोर्ट में लिखाया है कि हे मां मेडिकल स्टोर के हिमांशु अग्रवाल ने चेन्नई की जिस फैक्ट्री से दवा मंगाई है, वो उसके रिश्तेदार की है। तो फिर इस फैक्ट्री के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं? नरेश मोहन संदेह के घेरे में आ गए। इसी संदर्भ में एक और चर्चा जोरों पर है। जब हे मां के हिमांशु अग्रवाल ने रिश्वत के रूप में एक करोड़ रुपये दे दिए हालांकि वो भ्रष्टाचार के इसी कदाचार में जेल भेजा गया। तो बंसल मेडिकल वालों को क्यों यूं ही जाने दिया। बंसल मेडिकल को लेकर सौदेबाजी के लिए एक और चाल चली गई। नरेश मोहन के कब्जे में बंसल मेडिकल वालों के दोनों फोन थे, लेकिन, बाजार के एक व्यक्ति को फोन करके कहा था कि वे गोदाम खोलने के लिए इंतजार कर रहे हैं, संचालक अभी आया ही नहीं। इस व्यक्ति ने जब पता किया तो गोदाम संचालक मौके पर ही था।
सबसे बड़ा विलेन जीएसटी विभाग
दवा बाजार के जानकार बताते हैं कि दूसरे शहरों से दवाओं की खेप ट्रेन, बस से ही आती हैं। जीएसटी विभाग भी रेलवे स्टेशनों, बस अडडों पर नजर रखता है। इसके बावजूद दवा बाजार में अवैध दवाओं की खेप कैसे आती रहीं। ताजा मामले को ही लें तो आगरा कैंट स्टेशन से 90 लाख की दवाएं बगैर बिल के कैसे बाजार में पहुंच गईं। दरअसल, अवैध दवा के रैकेट में औषधि विभाग के साथ-साथ जीएसटी की भी भागीदारी बताई जा रही है। और, ये रैकेट लंबे समय से काम कर रहा है। जीएसटी विभाग अगर कहीं से अवैध दवाएं पकडृ़ता है तो औषधि विभाग को सूचित क्यों नहीं करता?
मेरी बात
मैनपुरी के एक छोटे से गांव से आकर आगरा महानगर में एक कदम रखने का प्रयास किया। एक अनजान युवक को अपना ठौर-ठिकाना बनाने की चुनौती थी। दैनिक जागरण जैसे विश्व प्रसिद्ध समाचार समूह ने सेवा करने का सुअवसर प्रदान किया। 9 जुलाई 2025 को दैनिक जागरण समाचार पत्र समूह से सेवानिवृत्त होने तक के पत्रकारिता के सफर के दौरान कई पड़ाव पार किए, कई पायदान चढ़े। समाज के विभिन्न वर्गों की रिपोर्टिंग की। सामाजिक और मानवीय संवेदनाओं से भरे पहलू मेरी पत्रकारिता के प्रमुख आधार रहे। संप्रति में दैनिक भास्कर समूह से जुड़कर अपनी पत्रकारिता के नए दौर में प्रवेश रखा है। अब कुछ अलग करके दिखाने की तमन्ना है। हमारे आसपास ही तमाम ऐसे कार्यकलाप होते हैं जो जनहित और समाजहित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, निभा सकते हैं लेकिन स्पष्ट कहूं तो कूपमंडूकता के कारण हम यहां तक पहुंच नहीं पाते, जान नहीं पाते। हम ऐसे ही अदृश्य व्यक्तित्व और कृतत्व को आपके सामने लाने का प्रयास करेंगे।
जय हिंद













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