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संकरी गलियों में बनीं गोदामों में छिपा है अवैध दवा के धंधे का राज

राजेश मिश्रा, आगरा: फव्वारा के दवा बाजार में छापा दो ही स्थितियों में मारा जाता है। या तो बड़ी मुखबिरी हुई हो या फिर गंभीर शिकायत। ऐसे में दुकान पर छापा मारा जाता है। कुछ दवाओं के नमूने ले लेकर कार्रवाई की खानापूरी कर दी जाती है। लेकिन, दवा के अवैध धंधे के राज तो उन गोदामों में छिपे हैं जो संकरी गलियों में हैं। यहां पर भरे जखीरा की एक-एक दवा की जांच शासन द्वारा प्राथमिकता पर कराई जाए और परीक्षण रिपोर्ट आने तक गोदाम को सील कर दिया जाए।

 फव्वारा में अमूमन दवा के अधिकांश विक्रेताओं के गोदाम हैं। कुछ गोदाम खुल्लमखुल्ला हैं जबकि ज्यादातर ऐसे स्थानों पर बनाए गए हैं जिनके बारे में विक्रेता के अलावा और कोई नहीं जानता। यहां तक गोदाम के आसपास के रहने वाले भी सच्चाई नहीं जानते।वो तो हे मां मेडिकल एजेंसी का मामला उच्चस्तरीय था, इसलिए इसके गोदाम भी खंगाल लिए गए, अन्यथा आमतौर पर छापामार कार्रवाई के दौरान गोदाम के बारे में पूछा भी नहीं जाता। वहां तक जाना तो दूर। रात में ट्रेन, प्राइवेट बसों के माध्यम से आने वाली खेप रातोंरात इन्हीं गोदामों में भर दी जाती है। और रात में ही यहां से सप्लाई की जाती है। बाजार के जानकारों के अनुसार, एक अनुमान है कि आगरा में दवा की ऐसी एक हजार से ज्यादा गोदामें हैं। इन गोदामों में भरी दवाओं की गहनता से पड़ताल की जाए तो अवैध कारोबार का एक और चौंकाने वाली तस्वीर सामने आ जाएगी।

  इन गोदामों से अवैध कारोबार से राजस्व चोरी के मामले तो पकड़े ही जाएंगे, घटिया दवा के नए नए खुलासे होंगे। जानकार एक तरीका भी बताते हैं। एक तो दवा के नमूनों की तत्परता और प्राथमिकता से जांच कराई जाए और दूसरे, जांच रिपोर्ट आने तक गोदाम को सील कर दिया जाए। दवा की परीक्षण रिपेार्ट के आधार पर अगली कार्रवाई की जाए। ये कार्रवाई ही बताएगी कि घटिया दवा की जड़ें कहां-कहां तक हैं और इसकी टहनियों पर कहां-कहां के धंधेखोर फलफूल रहे हैं।

 एमआरपी यानी मनमानी रेट प्राइज

देश  में दवाओं की कीमतें तय करने वाला मुख्य विभाग राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) है। ये प्राधिकरण रसायन और उर्वरक मंत्रालय के तहत आता है। यह प्राधिकरण भारत सरकार के दवा मूल्य नियंत्रण आदेश के अनुसार दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमतें निर्धारित करता है, ताकि दवाएं सस्ती और सुलभ हो सकें। ब्रांडेड कंपनियां तो इसका अनुपालन करती होंगी लेकिन, कुकुरमुत्तों की तरह से खुलीं फैक्ट्रियों में दवा की एमआरपी तय करने का कोई पैमाना होता भी है, इस पर संशय है। संशय इसलिए भी कि धंधेखोर कंपनी की तर्ज पर दवा तैयार कराकर रैपर पर वही एमआरपी प्रिंट कराते हैं। इतना ही नहीं, मोनेापोली वाली दवाओं की एमआरपी तो मनमानी ही होती है। मोनोपोली दवाएं अक्सर अस्पताल  के मेडिकल स्टोर या क्लीनिक के पास के खास मेडिकल स्टोर पर ही मिलतीं और बिकतीं हैं। जाहिर है कि इसमें लागत और कमीशन से लेकर मुनाफा तक का बजट शामिल करके एमआरपी प्रिंट कराई जाती है।

बहुत दागदार रहा है औषधि अनुभाग का दामन

आगरा में औषधि अनुभाग का दामन बहुत दागदार रहा है। विगत की बात की जाए तो यहां पर चार-चार ड्रग इंस्पेक्टर समय-समय पर रिश्वत लेते विजीलेंस द्वारा रंगे हाथ पकड़े गए। पीपी सिंह, के आर रमन, राकेश कुमारी राजपूत और केजी गुप्ता ऐसे ही नाम हैं। ड्रग इंस्पेक्टर के आर रमन की तो हत्या भी हो गई थी। बाजार के मनोनीत कुछ ठेकेदारों और औषधि अनुभाग के बीच का गठजोड़ भी बहुत मजबूत है। जब भी कोई विषम स्थिति होती है ये यही गठजोड़ बीच का रास्ता निकाल लेता है। औषधि अनुभाग अब प्रशासन के सीधे अधीन आ गया है। जिलाधिकारी अगर हर औषधि निरीक्षक की डेली रिपोर्ट की मानीटरिंग कराना शुरू कर दें, कितनी मेडिकल की  दुकानों पर चेकिंग की? कितने नमूने भरे आदि-आदि। औषधि निरीक्षक तो पसीना छोड़ जाएंगे।

मेरी बात मैनपुरी के एक छोटे से गांव से आकर आगरा महानगर में एक कदम रखने का प्रयास किया। एक अनजान युवक को अपना ठौर-ठिकाना बनाने की चुनौती थी। दैनिक जागरण जैसे विश्व प्रसिद्ध समाचार समूह ने सेवा करने का सुअवसर प्रदान किया। 9 जुलाई 2025 को दैनिक जागरण समाचार…

1 Comment

  1. Ramesh Rai says:

    आप सही दिशा में अपनी खुराक जारी रखें । अफसोस कि यह काला कारोबार अपने छोटे छोटे बांधों से रुक नहीं पाएगा पूरी नीति और ड्रग एक्ट में परिवर्तन की जरूरत है।👍✅

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