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हवेली की तिजोरी का खोल दिया ताला तो मालिक ने चांदी के सिक्कों से भर दी थी झोली

राजेश मिश्रा: बिखरे बाल, बढ़ी और बेतरतीब दाढ़ी, फटे-पुराने पहने कपड़े। बनी-अधबनी चाबियां, प्लास-पेचकस, छोटी हथौड़ी-छैनी आदि से भरा छोटा सा थैला। कोई सड़क किनारे फड़ सजाए ए रहता है तो कोई साइकिल पर थैला लटकाए कालोनियों-बस्तियों में फेरी लगाता है-चाबी बनवा लो, ताला खुलवा लो…। देखने में ये भले ही सामान्य नजर आते हैं लेकिन हुनर ऐसा कि इनके पास हर ताले की चाबी होती है। चाहे आधुनिक तकनीक वाला ताला हो या फिर, पुरानी हवेलियों की तिजोरी का। ऐसे ही हैं एक पप्पू चाबी वाला। मेरे घर के दरवाजे का एक ताला खराब हो गया था। चाबी काम नहीं कर रही थी। सिकंदरा-बाेदला रोड पर अपने ठिकाने पर बैठे पप्पू चाबी वाले को घर ले आए। दरवाजे में अंदर से फिट ताले को इधर-उधर से देखा। थोड़ा मनन किया, फिर खोल लिया अपना थैला। बिखेर दीं चाबियां और एक पल में ही चुन ली एक चाबी। छैनी से उसे एक आकार दिया, रेती से चिकना किया और ताला में लगाया। थोड़ी सी मशक्कत के बाद ताला खुल गया। भई वाह, मान गए पप्पू। पप्पू बोले- ये तो कुछ भी नहीं है साहब, मैंने तो बड़े-बड़े शातिर ताले भी खोले हैं। उत्सुकता बढ़ी तो पूछ लिया-कौन-कौन से, कहां-कहां?
 पप्पू सीना चौड़ा कर अपनी कहानी सुनाने लगे। मूल रूप से वे मथुरा के रहने वाले हैं। चाबी बनाने का पुश्तैनी काम है। परिवार, रिश्तेदार आदि सभी इसी कार्य से जुड़े हैँ। गांव के ज्यादातर लोग गुजरात में पहले ही चले गए थे। पप्पू और उनके परिवार के कुछ लोग आगरा में आकर रहने लगे। सवाल फिर ताले पर आकर टिक गया। पप्पू ने बताया कि आज से करीब 35-36 साल पहले की बात है। पिता की देखरेख में वे ताला खोलने, चाबी बनाने का काम सीख चुके थे। मथुरा जिले में ही एक गांव में हवेली थी। (हवेली मालिक का नाम तो पप्पू को याद नहीं लेकिन, किसी कारण से गांव का नाम उजागर नहीं कर रहे हैं)।हवेली में एक तिजोरी थी। उसका ताला नहीं खुल रहा था। हवेली मालिक ने पिता से संपर्क किया। पिता ने मुझे भेज दिया। पप्पू की बात पर भरोसा करें तो हवेली में वो तिजाेरी एक दीवाल में चिनी थी। तिजोरी इतनी बढ़ी थी कि कमरे की एक दीवार तिजोरी की थी।  और, वजन? इसका तो अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। खैर, ताला खोलने का प्रयास शुरू कर दिया। कुछ देर के प्रयास के बाद जब ताला खोल देने का भरोसा हो गया तो मालिक से कहा कि ताला खाेल दें तो इनाम में क्या दोगे? मालिक भी दिलदार था। कहा कि झोली भर दूंगा। मालिक की बात पर भरोसा कर पप्पू अपने मिशन में जुट गए। कई घंटों की मशक्कत के बाद ताला आखिर खुल गया। पप्पू की मानें तो तिजोरी खुलते ही उसमें रखे जेवरातों की चमक से उनकी आंखें वास्तव में चौंधियां गई थीं। लगा कि वो सपना देख रहा है। काफी देर बाद वो सामान्य हो पाया।  बकौल पप्पू, हवेली मालिक से उसने अपनी जिज्ञासा जाहिर की। मालिक ने बताया कि परिवार के बुजुर्गों ने बताया था कि ये तिजोरी उनके पूर्वज ने बनवाई थी। देश में अंग्रेजी शासन हुए दो-तीन महीने ही हुए थे। पूर्वज को डर था कि अंग्रेजों को पता चला तो तिजोरी लूट कर ले जाएंगे। इसलिए वो कमरा कभी खोला ही नहीं गया। सैकड़ों वर्ष बीतने के बाद ताला खराब हो गया।
 अब बारी थी इनाम लेने और देने की। पप्पू ने बताया कि मालिक ने हमसे कहा कि झोली फैलाओ। मैंने अपनी शर्ट की झोली फैला दी। मालिक ने तीन बार में चांदी के सिक्के झोली में डाल दिए। घर आकर गिने तो ये 700 सिक्के थे। क्या किया इन सिक्कों का, मेरे सवाल पर पप्पू ने बताया कि पिता ने पूरे परिवार के लिए जेवर बनवा दिए। मेरी शादी के लिए भी जेवर बनवाए थे। तब हमारी तो किस्मत ही बदल गई थी। लेकिन, जिंदगी फिर ढर्रे पर आ गई।

 एक बार एक लाख रुपये ताला खोलने के
 पप्पू, तुम एक दिन में कितना कमा लेते हो? पप्पू ने कहा कि कभी कुछ सौ रुपये तो कभी-कभार हजार भी। एक बार तो एक लाख रुपये लिए थे। कहां? पप्पू ने बताया कि आगरा में ही एक कोठी में ताला खराब हो गया। मालिक हमें यहां से बुला ले गया। हमने ताला देखा। कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि कैसे खुलेगा। कुछ देर बाद मैंने कहा कि एक लाख रुपये लूंगा। ये रकम ये सोचकर बताई थी कि एक लाख रुपये कौन देगा? मना कर देगा, लौट कर चले आएंगे। मगर, मालिक ने कहा- दूंगा। अब मैं अपनी बात में फंस गया था। मैं ताला खोलने की कोशिश करने लगा। कई घंटे के बाद आखिर ताला खुल गया। मालिक ने मुझे एक लाख दिए भी। इसी तरह, जलेसर में एक ताला खुलवाने के लिए लोग आए। मैंने 50 हजार रुपये मांगे। वो तैयार हो गए। अपनी गाड़ी से मुझे ले गए। मैंने ताला खोल दिया। 50 रुपये मिले थे। पप्पू ने एक और रोचक किस्सा सुनाया। संजय प्लेस में किसी कंपनी का बड़ा कार्यालय था। कार्यालय में आग लग गई थी। एक कमरे का ताला नहीं खुल रहा था। मैं वहां गया। थोडृे से प्रयास के बाद जैसे ही ताले में चाबी फिट हुई, चाबी घुमाई तो घूम गई। ताला खुल गया,लेकिन…, तभी मालिक ने कहा कि अब तुम रुपये लो और जाओ। पप्पू का कहना था कि पता नहीं उस कमरे में क्या था कि मालिक ने मेरे सामने ही न तो ताला खोला और न ही कमरे को।

शुक्रवार को ही थैला करते हैं साफ
दरवाजे के ताले के लिए पप्पू जब थैले में चाबियां तलाश रहे थे तो मैंने कहा कि थैला जमीन पर उलट दो। पप्पू ने कहा कि आज मंगलवार है, थैला खाली नहीं कर सकते। मैं चौका, ऐसा क्या है? पप्पू ने बताया कि बड़े-बुजुर्ग कह गए हैं कि थैला शुक्रवार को ही साफ करना है। इसके पीछे क्या तर्क रहा होगा, ये तो मुझे पता नहीं। मगर, बुजुर्गों की बात का हम लोग पूरी तरह से पालन करते हैं।

गलत काम से दूर रहते हैं साहब
चोरी के कई मामले ऐसे आ चुके हैं जिसमें चाबी बनाने वाले ही पकड़ृे गए हैँ। लोग कैसे तुम लोगों पर विश्वास करें। पप्पू ने बड़ा ही अच्छा जवाब दिया। कहा कि एक मछली पूरे तालाब हो गंदा कर देती है साहब। मेरे बुजुर्ग कह गए थे कि नीयत खराब नहीं करना। अपनी मेहनत और हुनर का ही खाना। पप्पू ने कहा कि जो लोग गलत काम करते हैं, उन्हें भुगतना भी तो पड़ता है। कम लगेगा तो हम आपसे रुपये और मांग लेंगे लेकिन, चोरी-चकारी नहीं कर सकते।

बच्चे भी करेंगे यही काम
पप्पू ने दावा किया कि वो ताला खोल देंगे। मगर, अब तो कम्प्यूटर वाले लॉक भी आ गए हैं, उन्हें नहीं खोल सकते। कम्प्यूटर की जानकारी ही नहीं है। सीख भी नहीं सकते। पढे-लिखे ही नहीं हैं। बच्चे भी यही करेंगे? पप्पू ने कहा कि कम्यूटर वाले ताले कितने लोग लगवाते हैं? बहुत कम। मगर, आम ताले तो ज्यादातर लोग लगवाते ही हैं। इसलिए हमारा काम आगे भी चलता रहेगा। बच्चे भी यही काम करेंगे।

मेरी बात मैनपुरी के एक छोटे से गांव से आकर आगरा महानगर में एक कदम रखने का प्रयास किया। एक अनजान युवक को अपना ठौर-ठिकाना बनाने की चुनौती थी। दैनिक जागरण जैसे विश्व प्रसिद्ध समाचार समूह ने सेवा करने का सुअवसर प्रदान किया। 9 जुलाई 2025 को दैनिक जागरण समाचार…

1 Comment

  1. Yogesh jadon says:

    अच्छा है, मगर इस प्लेटफार्म पर अखबार की तरह खबर न लिखकर बाक्स यानी छोटे छोटे सबहैड देकर। वैसे आफबीट खबर का सब्जैक्ट शानदार है

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