-करीब पंद्रह हजार श्रद्धालु 40 दिन तक करते हैं यात्रा, 40 होते हैं पड़ाव
-हर दिन एक पड़ाव स्थल पर सजते हैं छोटे-बड़े करीब एक हजार टैंट
-देखने वालों को चौंकाती है एक साथ इतने श्रद्धालुओं के लिए भोजन व्यवस्था
-गांव में घर-घर बेली और सेंकी जाती हैं रोटियां, कड़ाहों में बनतीं हैं सब्जियां
-भक्ति की डोर में बंधे श्रद्धालुओं का अनुशासन भी है एक मिसाल
-36 वर्ष से अनवरत जारी है राधारानी ब्रज चौरासी कोस यात्रा
राजेश मिश्रा, ब्रज की राहों पर सुबह-सुबह राधे-राधे जपते हुए श्रद्धालुओं की कतारबद्ध अपार भीड़। लाउडस्पीकर पर भक्तिपरक गीतों के मधुर सुर और ह्रदय को आल्हादित करती धुन। राधारानी ब्रज चौरासी कोस यात्रा को देखने में एक सामान्य आयोजन प्रतीत होता है। मगर, दस हजार से ज्यादा श्रद्धालुओं की अनुशासित भीड़ और 40 दिनों तक हर रोज 40 पड़ाव। हर पड़ाव पर पहुंचने से पहले ही विशालकाय क्षेत्र में सजी-संवरी कॉटेज में श्रद्धालुओं के लिए रहने-ठहरने, खानपान, सत्संग आदि की चौकस व्यवस्था। लिखने और पढ़ने में जितना सामान्य लगता है, इसका प्रबंधन उतना ही चमत्कारिक है। कैसे बनती है योजना, कैसे और क्या-क्या होती है तैयारी, कितने लोग जुड़े होते हैं व्यवस्थाओं से, बड़े-बड़े मैनेजमेंट संस्थानों के लिए ये रिसर्च टापिक बन चुका है। कई संस्थानों के प्रतिनिधि इस पर अध्ययन भी कर चुके हैं। मान मंदिर सेवा संस्थान ट्रस्ट, बरसाना के सचिव सुनील सिंह तो यही कहते हैं कि राधारानी की कृपा बरसती है तब ये यात्रा निकलती है। ब्रज के विरक्त संत रमेश बाबा ने ब्रज चौरासी कोस यात्रा की परिकल्पना संजोई थी। उनके आशीर्वाद और निर्देशन में ये यात्रा वर्ष 1988 से शुरू हुई। चूंकि राधारानी की कृपा थी, इसलिए यात्रा का नामकरण उन्हीं के नाम पर किया गया- श्रीराधारानी ब्रज चौरासी यात्रा। साल दर साल यात्रा के दौरान आभास की गईं असुविधाओं को समय-समय पर परिमार्जित किया जाता रहा। आज ये यात्रा प्रबंधन का एक अतुलनीय उदाहरण है। इस वर्ष की यात्रा में करीब 15 हजार श्रद्धालुओं ने पंजीकरण कराया। यात्रा में करीब साढ़े बारह हजार श्रद्धालु शामिल हुए।
भोजन व्यवस्था
हर तड़के करीब ढाई बजे श्रद्धालु सोकर उठ जाते हैं। स्नानादि के बाद साढ़े तीन बजे यात्रा के लिए तैयार हो जाते हैं। पड़ाव स्थल पर ही उन्हें काढ़ा दिया जाता है। औषधीय गुणों वाला ये काढ़ा श्रद्धालुओं को चुस्त-दुरस्त रखता है। आरती के बाद यात्रा अगले पड़ाव की ओर रवाना हो जाती है। हर रोज यात्रा 12 से 15 किमी तक चलती है। अगले पड़ाव स्थल पर पहुंचते ही श्रद्धालुओं को भव्य पंडाल में भोजन दिया जाता है। भोजन करने के बाद श्रद्धालु कुछ घ्ंटे आराम करते हैं। फिर सत्संग होता है। रात साढ़ृे आठ से नौ बजे तक भोजन करने के बाद श्रद्धालु सो जाते हैं। अब कल्पना कीजिए। एक साथ दस हजार से बारह हजार श्रद्धालुओं के लिए भोजन तैयार करना और वितरण इतना आसान नहीं है। इसके लिए मान मंदिर ट्रस्ट बरसाना के परिसर में रसोई संचालित होती है। इनमें चार कड़ाहों में सब्जी बनाई जाती है। नजदीकी गांव में घर-घर रोटियां बेली और सेंकी जाती हैं। तैयार खाना व्यवस्थित तरीके से आधुनिकतम वाहनों से पड़ाव स्थल पर पहुंचा दिया जाता है। ये क्रम सुबह और शाम 40 दिनों तक चलता रहता है। बड़े-बड़े लंगर चलाने वाले कई सेवा संस्थानों के प्रतिनिधि यहां आकर भोजन व्यवस्था को देख चुके हैं।
टैंट व्यवस्था
भोजन से भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण कार्य श्रद्धालुओं के लिए टैंट व्यवस्था का होता है। किसी बडे आयोजन के लिए टैंट आदि की व्यवस्था कई दिन पहले से होती है लेकिन, यात्रा में ये कार्य उसी दिन चंद घंटों में ही हो जाता है। पड़ाव स्थल 20 से 25 बीघा जमीन पर बनाया जाता है। अगर संख्या के अनुसार बात की जाए तो पड़ाव स्थल पर 800 से एक हजार टैंट लगाए जाते हैं। इनमें कॉटेज, खाने के पंडाल, कीर्तन-संगीत के पंडाल, हॉल आदि शामिल होते हैं। मान मंदिर ट्रस्ट के पास संपूर्ण टैंट सिस्टम के दो सेट हैं। सुबह यात्रा रवाना होते के बाद टैंट उखाड़ा जाता है और अगले पड़ाव स्थल पर लगा दिया जाता है। इतनी त्वरिता से ये कैसे संभव हो जाता है। ट्रस्ट सचिव सुनील सिंह बताते हैं कि पिलर लगाने और उखाडने, कपड़ा तानने और हटाने, सामान को एकत्रित करने, दूसरे स्थान पर ले जाने जैसे हर कार्य के लिए अलग-अलग टीम होती है। कुल मिलाकर एक सौ से ज्यादा कर्मचारी होते हैं जो अपने-अपने काम शीघ्रता से कर देते हैं। सचिव बताते हैं कि मैनेजमेंट के बारे में चर्चा सुनने पर एक बार एक केंद्रीय सुरक्षा बल के अधिकारी आए थे। वे टैंट मैनेजमेंट की शीघ्रता देखकर दंग रह गए थे। कह रहे थे कि यहां तो हमारे यहां भी तेज काम होता है। आगरा की प्रतिष्ठित फर्म नेतराम एंड संस के संचालक शिविर जैन तो कहते हैं कि ये व्यवस्था एक चुनौतीपूर्ण है। हर रोज नए पड़ाव स्थल पर इतने विशाल क्षेत्र में टैंट लगाना कोई सामान्य बात नहीं है।
एक प्रांत, एक भाषा
जिस समागम में दस-बारह हजार श्रद्धालुओं की भीड़ हो, जाहिर है कि वे अलग-अलग प्रांत के होंगे, अलग-अलग जाति होगी, उनकी अलग-अलग भाषा होगी, अलग-अलग जीवनशैली और खानपान होगा। मगर, राधारानी ब्रज चौरासी कोस यात्रा के दौरान ये सभी दायरे सिमट जाते हैं। सबका एक ही प्रांत होता है- ब्रज। सबकी एक ही बोली होती है- राधे-राधे। सबका एक ही खानपान होता है- प्रसाद। यात्रा के दौरान बैंक भी चलती है। अगर किसी श्रद्धालु को रुपये की जरूरत होती है तो इसी बैंक से वो रुपये ले सकता है। यात्रा के साथ ही चिकित्सकीय टीम भी चलती है।
संत रमेश बाबा जी महाराज ने वर्ष 1988 में की शुरुआत
मान मंदिर सेवा संस्थान ट्रस्ट के सोशल मीडिया नेटवर्क में उल्लिखित है कि राधा रानी ब्रज यात्रा की शुरुआत ब्रज के विरक्त संत रमेश बाबा महाराज ने वर्ष 1988 में की थी। इस यात्रा की शुरुआत बाबा जी महाराज के हृदय में असीम दया और करुणा का परिणाम थी। इस यात्रा का नाम उनके या किसी मंदिर या संप्रदाय के नाम पर नहीं रखा गया। इसका नाम श्री राधा रानी के नाम पर रखा गया। राधा रानी ब्रज यात्रा अनोखी है क्योंकि इसे वास्तव में श्री राधा रानी स्वयं चलाती हैं। बाबा जी महाराज कहते हैं कि उन्होंने इस यात्रा की शुरुआत श्री राधा रानी पर पूरी तरह से निर्भर होकर की थी। इस अर्थ में कि यात्रा की सभी ज़रूरतें श्री राधा रानी ही पूरी करेंगी।
मेरी बात
मैनपुरी के एक छोटे से गांव से आकर आगरा महानगर में एक कदम रखने का प्रयास किया। एक अनजान युवक को अपना ठौर-ठिकाना बनाने की चुनौती थी। दैनिक जागरण जैसे विश्व प्रसिद्ध समाचार समूह ने सेवा करने का सुअवसर प्रदान किया। 9 जुलाई 2025 को दैनिक जागरण समाचार पत्र समूह से सेवानिवृत्त होने तक के पत्रकारिता के सफर के दौरान कई पड़ाव पार किए, कई पायदान चढ़े। समाज के विभिन्न वर्गों की रिपोर्टिंग की। सामाजिक और मानवीय संवेदनाओं से भरे पहलू मेरी पत्रकारिता के प्रमुख आधार रहे। संप्रति में दैनिक भास्कर समूह से जुड़कर अपनी पत्रकारिता के नए दौर में प्रवेश रखा है। अब कुछ अलग करके दिखाने की तमन्ना है। हमारे आसपास ही तमाम ऐसे कार्यकलाप होते हैं जो जनहित और समाजहित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, निभा सकते हैं लेकिन स्पष्ट कहूं तो कूपमंडूकता के कारण हम यहां तक पहुंच नहीं पाते, जान नहीं पाते। हम ऐसे ही अदृश्य व्यक्तित्व और कृतत्व को आपके सामने लाने का प्रयास करेंगे।
जय हिंद















