13 साल का लंबा दरम्यान गुजर चुका था। मैं अपनी जिंदगी जीने लगी थी। उम्मीद तो नहीं थी, फिर भी प्रयास किया अपने माता-पिता ढूंढ़ने का। मगर, मुझे तो ये भी नहीं पता था कि मैं कहां रहती थी? मां से मिलन की दास्तां बाद में, पहले बात मां के आंसुओं पर। मां जब मिली तो उसकी अश्रुधार ने मुझे भिगो दिया। वो अपने कसूर पर कोस रही थी। मुझे उनके कसूर का तो पता नहीं मगर इस दौरान बिछोह की सजा वो भुगतती रहीं जबकि अपराध तो मेरी नादानी ने किया था।
बुधवार को जगदीशपुरा की बस्ती में मां से उसकी बेटी और बेटा के मिलन संयोग को देखने वाली हर आंख खुशी से नम थी। …और, मिलने वालों की आंखों के आंसू अपनी बात कह रहे थे। मजदूरी कर गुजर-बसर करने वाली दुलीचंद अपनी पत्नी नीतू, बेटी राखी और बेटा बबलू के साथ खुश थे। 13 साल पहले नीतू ने किसी बात पर राखी को चिमटा मार दिया। क्षुब्ध राखी अपने भाई को लेकर घर से निकल दी। कोई मुकाम नहीं था। मेरठ में पुलिस ने ट्रेन से उतार लिया। अनाथालय में समय गुजारने के बाद राखी गुरुग्राम में एक माल में सेल्सगर्ल बन गई और बबलू बेंगलुरु में मोबाइल फोन मैकेनिक। घर परिवार होता तो पढ़ने-लिखने की सीख मिलती। राखी के माता-पिता तो मजदूर थे। बच्चे भी मजदूरी ही करते। लेकिन, मां-बाप से दूर रहते हुए भी राखी और बबलू ने सूझबूझ से काम लिया। राखी ने शिक्षा पर ध्यान दिया तो बबलू ने हाथ का हुनर हासिल करने का। जब जिंदगी को राह मिल गई तो माता-पिता की याद आने लगी। सोचा कहीं तो होंगे मेरे माता-पिता। लेकिन, न राखी और न बबलू को, ये भी नहीं पता था कि वे किस जिला में कहां रहते थे। असहाय और बेसहारा बच्चों के हमदर्द सामाजिक कार्यकर्ता नरेश पारस से किसी तरह से फोन पर संपर्क किया। नरेश पारस ने अपने अथक प्रयास से राखी और बबलू की अंजान निवासी मां को ऐसे खोज निकाला जैसे सागर से कोई मोती। नरेश पारस के प्रयास से राखी और बबलू को अपनी मां मिल गई। घर छोड़ने का क्या उसे अफसोस है? राखी ने कहा कि मुझे नहीं पता था कि नादानी में कितना बड़ा अपराध कर दिया। मुझे तो अब तक ये भी समझ नहीं पा रही कि घर छोड़ा ही क्यों था? मां से मिलकर ये जरूर पता लगा कि सजा मां भुगतती रही जबकि अपराध तो मेरी नादानी ने किया था। घर छोड़कर। मुझे अभी भी समझ में नहीं आ रहा आखिर घर छोड़ा ही क्यों था? मां ने अब बताया कि उसने मुझे चिमटा मारा था। लेकिन, मुझे तो याद ही नहीं। हां, मां तो मिल गई लेकिन खोया बहुत कुछ। बचपन खो दिया। अपनों का प्यार खो दिया। पापा तो मिले ही नहीं। नानी शकुंतला ने मुझे बताया कि तेरे जाने के बाद ही मेरे पापा मानसिक रूप से बीमार हो गए। कहां गए, अब तक पता नहीं। किस हाल में होंगे, ये भी पता नहीं। अब मां को साथ रखूंगी। मैं और बबलू मिलकर पिता की तलाश करूंगी। मां को अब मजदूरी नहीं करने दूंगी। हम हैं ना। माता-पिता की डांट से बच्चों के घर छोड़ने के मामले अक्सर सामने आते रहते हैं, ऐसे बच्चों के लिए क्या कहना चाहेंगी? राखी ने कहा कि मेरी तरह नादानी कोई न करे। घर तो कतई न छोड़े।
मेरी बात
मैनपुरी के एक छोटे से गांव से आकर आगरा महानगर में एक कदम रखने का प्रयास किया। एक अनजान युवक को अपना ठौर-ठिकाना बनाने की चुनौती थी। दैनिक जागरण जैसे विश्व प्रसिद्ध समाचार समूह ने सेवा करने का सुअवसर प्रदान किया। 9 जुलाई 2025 को दैनिक जागरण समाचार पत्र समूह से सेवानिवृत्त होने तक के पत्रकारिता के सफर के दौरान कई पड़ाव पार किए, कई पायदान चढ़े। समाज के विभिन्न वर्गों की रिपोर्टिंग की। सामाजिक और मानवीय संवेदनाओं से भरे पहलू मेरी पत्रकारिता के प्रमुख आधार रहे। संप्रति में दैनिक भास्कर समूह से जुड़कर अपनी पत्रकारिता के नए दौर में प्रवेश रखा है। अब कुछ अलग करके दिखाने की तमन्ना है। हमारे आसपास ही तमाम ऐसे कार्यकलाप होते हैं जो जनहित और समाजहित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, निभा सकते हैं लेकिन स्पष्ट कहूं तो कूपमंडूकता के कारण हम यहां तक पहुंच नहीं पाते, जान नहीं पाते। हम ऐसे ही अदृश्य व्यक्तित्व और कृतत्व को आपके सामने लाने का प्रयास करेंगे।
जय हिंद















